नकाब
एक नकाब वाला घुमता था…
कभी गलियां , कभी शहरो मे, कभी गाओ , तो कभी मेले मे….
कभी गलियां , कभी शहरो मे, कभी गाओ , तो कभी मेले मे….
तरह तरह के नकाब रहते थे पास उसके….
जानवर थे कुछ तो कुछ थे जोकर, कुछ भगवान भी रहते थे लटकते कई राक्षसोंकेबिच…
कुछ हसते, कुछ मुस्कुराते, कुछ रोते… कुछ तो ऐसे थे कि जैसे साप सूंग गया हो….
जानवर थे कुछ तो कुछ थे जोकर, कुछ भगवान भी रहते थे लटकते कई राक्षसोंकेबिच…
कुछ हसते, कुछ मुस्कुराते, कुछ रोते… कुछ तो ऐसे थे कि जैसे साप सूंग गया हो….
नकाब भी ऐसे की नकाब नही जिंदगिया हो अलग अलग इनकी…
खरीदकर कोइ अपने दर्द छुपाता तो कोइ असलियत…. कुछ तो खुशिया तक छुपा जाते थे इनसे ढककर.
खरीदकर कोइ अपने दर्द छुपाता तो कोइ असलियत…. कुछ तो खुशिया तक छुपा जाते थे इनसे ढककर.
एक दिन उससे पुछा तुम्हे कौनसा पसंद है इनमे….
उसने कहा साहब भूख पर चढनेवाला बनाने मे जुटा हूँ…
बनतेही बेचने आ जाउंगा
उसने कहा साहब भूख पर चढनेवाला बनाने मे जुटा हूँ…
बनतेही बेचने आ जाउंगा
दर्शन
No comments:
Post a Comment