दिसामाजी लिहावे काही
Sunday, February 12, 2017
जनाज़ा
वह जिंदगीभर इक झूट मे जिया
कि महोताज नही किसिका
फिर इक दिन वह चार मिले
जिन्होने जनाज़ा उठा लिया
– दर्शन
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