Sunday, February 12, 2017

दोस्ती

दोस्ती तो कागज़ के कश्तीयों पर सवार पानी मे दूर दूर तक बहती रहती थी|
और पतंगो के साथ कभी हवाओ पर होकर सवार उडा करती थी|
कभी आम के पेडो से गिरे आमो मे आधी आधी बटा करती थी|
कभी छुट्टीयो वाली दोपहर ढेर सारी बातोमे घंटो गुजारा करती थी|
तो कभी चारो मे बटी एक सिगरेट से निकलते धुए मे हवा हो जाती थी|
फिर बाईक पर सवार होकर किसी रात पुरे शहर के चक्कर काटती रहती थी|
उस दोस्ती को ढुंढ रहा हु.
न जाने कही खो सि गयी है|
किसि रोज मिल जाए तो उस दिन फ्रेंड्शीप डे मनाउंगा|
– दर्शन

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